हल षष्टी या ललई छठ व्रत कथा | Hal shashti aur lalai chath vrat katha |

हिन्दू धर्म में व्रत का बहुत महत्व होता है। इस ब्लॉग में हम आपको भाद्रपद मास में रखे जाने वाला हल षष्टी या ललई छठ की पूजन विधि व व्रत कथा बताएँगे।

भारत में हर महीने बहुत से व्रत और त्यौहार मनाए जाते है। यह त्यौहार ही है जो हम सब में ऊर्जा का संचार करते है। त्योहारों में ही हम आपसी मतभेद मिटाकर सभी के लिए मंगल कामनायें करते है। हर व्रत और त्यौहार में कुछ सीख छुपी होती है। जिन्हें जानने, समझने और अपने जीवन में उतारने की जरूरत होती है।

जैसा कि आपको पता होगा कि 9 अगस्त 2020, रविवार को हल षष्टी का व्रत है। और इस व्रत को बहुत सी महिलायें रखती है। तो आज हम आपको बताएँगे कि हल षष्टी या ललई छठ का व्रत कैसे रखा जाता है और व्रत कथा भी बताएँगे।

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हल षष्टी या ललई छठ व्रत की भूमिका

यह व्रत भाद्रपद की कृष्ण पक्ष की षष्टी को रखा जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी का जन्म हुआ था। कुछ लोग माता सीता या माता जानकी का जन्मदिवस भी इसी दिन को मानते है।

भगवान बलराम का मुख्य शस्त्र हल और मुसल है इसलिए उन्हें हलधर भी कहा जाता है। उन्ही के नाम पर इस दिन को हम हल षष्टी के रूप में बनाते है। भारत देश के पूर्वी जिलों में इसे ललई छठ के नाम से जाना जाता है। इस दिन महुए की दातुन करने की परंपरा है। इस व्रत में हल द्वारा जुता हुआ अन्न व फल खाना वर्जित ( मना ) है। इस दिन भैस का दूध व उससे बना दही का उपयोग किया जाता है।

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विधान

इस दिन प्रातः काल स्नान आदि करके धरती पर एक तालाब बनाया जाता है। जिसमें झरबेरी, पलाश, गूलर की एक- एक शाखा को बांधकर बनाई गई हर छठ को गाड़ दिया जाता है। और इसकी पूजा की जाती है। पूजन में सतनजा ( सात अनाज ) जिसमें गेहूँ, चना, मक्का, ज्वार, बाजरा, धान, जौ आदि का बना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। इसमें हल्दी में रंगा हुआ वस्त्र व सुहाग सामग्री भी चढ़ाई जाती है।

पूजन के बाद निम्न मंत्र का उच्चारण किया जाता है –

गंगा द्वारे कुशावर्ते बिल्वके नील पर्वत।

सनात्या कनखले देवि हरं सन्धवती पतिम्।।

र्लालते सुभगे देवि सुख सौभाग्य दायिनी।

अनन्त देहि सौभाग्यं मह्यं तुभ्यं नमो नमः।।

अर्थ :- हे देवी ! आपने गंगाद्वार, कुशावर्त, बिल्वके, नील पर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य को देने वाली ललिता देवी आपको बारंबार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिये।

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हल षष्टी या ललई छठ की व्रत कथा

एक समय की बात है, एक गर्भवती ग्वालिन एक झोपड़ी में रहती थी। वह दूध – दही बेचती थी। उसके प्रसव का समय समीप था। एक दिन उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। लेकिन उसका दूध – दही बेचने के लिए रखा हुआ था। उसने सोचा कि यदि बच्चे ने जन्म ले लिया तो वह दूध – दही बिक नहीं पाएगा। यही सोचकर वह उठी और उसने दूध व दही के मटके अपने सिर पर रखे उन्हें बेचने के लिए गांव की तरफ चल दी।

लेकिन रास्ते में उसकी प्रसव पीड़ा बढ़ गयी। उसे झरबेरी का पेड़ दिखता है और वह उसी में ओट में जाकर बैठ जाती है। वहाँ वह एक सुन्दर पुत्र को जन्म देती है। अल्हड़ ग्वालिन अपने पुत्र को एक कपड़े में लपेटकर पेड़ के नीचे झाड़ियों मे छिपा देती है और दूध व दही के मटके उठाकर उन्हें बेचने के लिए चल देती है।

उस दिन हल षष्टी थी। हालांकि उसके पास जो दूध – दही था, वह गाय भैंस का मिला जुला था। किन्तु उसने बेचते समय सभी को यही बताया कि वह सिर्फ भैंस का दूध है। जिस कारण उसका सारा दूध – दही बिक गया।

जहाँ ग्वालिन ने अपने पुत्र को छुपाया था, वही पास में एक किसान हल चला रहा था। अचानक उसके बैल बिदककर खेत की मेढ़ पर चढ़ जाते है। जिस कारण हल की नोक बच्चे के पेट से टकरा जाती है और बच्चे का पेट फट जाता है। किसान तुरंत झरबेरी के काँटों से बच्चे के पेट में टांके लगा देता है और बच्चे को वही छोड़ कर अपने घर चला जाता है।

ग्वालिन जब अपना सामान बेचकर वापिस आती है तो उसे अपना बच्चा मृत अवस्था में मिलता है और वह सोचती है कि यह मेरे पापों का ही फल है। मैंने आज हल षष्टी के दिन झूठ बोलकर सभी स्त्रियों को गाय व भैस का मिला जुला दूध बेचा, जिससे उनका व्रत भंग हो गया।

उसे अपनी गलती का पछतावा होता है और वह प्रायश्चित करने के लिए वापिस उसी गांव में जाती है और सभी को चिल्ला – चिल्लाकर सच बता देती है। सच सुनकर सभी स्त्रियाँ अपने धर्म रक्षा के विचार से उसे आशीर्वाद देती है। अब वह वापिस अपने पुत्र के पास पहुँचती है तो वह अपने पुत्र को जीवित अवस्था में पाती है। उसी समय वह कसम खाती है कि वह अपने पाप छुपाने के लिए कभी झूठ नहीं बोलेंगी।

कथा पढ़कर आप समझ गए होंगे कि हल षष्टी का व्रत त्यौहार से हमें क्या सीख मिलती है। समझ गए हो तो हमें कमेंट करके बताए। उम्मीद है आपको हमारी पोस्ट अच्छी लगी होगी।

पढ़ने के लिए धन्यवाद 😊😊

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